Waqt ki chheetein

अनजाने बनते चले हैं
मेरे जानने वाले
कैसे समझाऊँ उन्हें जो
बनते मेरे चाहने वाले

जिद छोटी सी जीने की
है मेरी अपनी तरह
दुनिया की बनी बनाई लकीरों को
कैसे अपना लूँ इस तरह

वजूद मेरा जवाब मांगता है
ख्वाब मेरा जवाब मांगता है
अपनी राह पर ही रहना
खुद रास्ता जवाब मांगता है

दोस्ती निभा न सकूँगा
रिश्ते निभा न सकूँगा
दिल लेने देने की बात तो दूर
खुद से वादा शायद निभा न सकूँगा

माफी की क्या उम्मीद करूँ
गलती तो बहुत सी होंगी
किसी राह पर चल निकला हूँ वरना
उम्मीदें तो मुझसे भी बहुत सी होंगी

अकेलापन डसता था कभी
कभी डरता था खोने से
खुद को पर समझाना ही था
यूं काम न चलेगा रोने से

अनजाने समंदर मे
अकेले नाविक की तरह
चल निकला हूँ
किस ओर क्या पता

किसी के सवालों का
क्या जवाब दूँ
कि जाना कहाँ क्या मंज़िल
इसका पैगाम उन्हे क्या दूँ

इतना समझ लो कि
बस अभी तो नाव को खेना है
वक़्त को छीटों को सहते सहते
हौले हौले आगे बढ़ना है ||

Little bit inspired from "Waqt aane pe bata denge tujhe ae aasmaan, hum abhi se kya batayein kya hamare dil mein hai"
(Sachin)

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